मेरे दिमाग में घोर द्वंद्व छिड़ गया और एक बार उसके जोबन का मर्दन करने की भयंकर अभीप्सा होने लगी।

और जैसे ही उसने कहा कि “नहीं मिल रहा तो छोडो यहाँ, कहीं और देखो।”

तो लगा कि बस ये आखरी सेकंड है। करना है तो कुछ कर ले।

मैंने हाथ ऊपर से खींच कर बाहर निकालने के बजाय सीधे उसके उभार पर हथेली रखी और पल भर में एक बार उसे दबाकर इतनी जल्दी हाथ बाहर खींचा कि उसे कुछ समझ ही नहीं आया कि क्या हुआ।

बाप रे बाप, कितने बड़े हैं, इसके दुद्दू !! और कितने गुदगुदे और कड़क भी ! बाहर से जितने उभरे लगते हैं, शायद उससे भी कहीं ज्यादा बड़े होंगे। उन्हें इतना सा दबा कर भी लगा कि लाइफ बन गई यार।

और फिर वो कुछ प्रतिक्रिया दे उससे पहले ही पूछ बैठा- अब कहाँ देखा जाये?

तो उसने सुझाव दिया- हो सकता है वो सरक कर जींस के अन्दर ना चला गया हो। एक बार उधर भी चेक कर लो।

यह कहते ही उसने अपने दोनों पैर बारी-बारी से घुटनों से नीचे मोड़ कर वज्रासन की मुद्रा में कुर्सी पर आड़ी बैठ गई, मुँह साइड रेस्ट की तरफ और पिछवाड़ा सीधे मेरी तरफ।

अब उसने आगे से अपना बेल्ट और बटन खोल कर जींस को थोड़ा सा नीचे करते हुए उसमे पीछे से हाथ घुसाने की व्यवस्था कर दी।