दो बच्चों का पिता होने के बावजूद मेरा अपने मुहल्ले में रहने वाली मनीषा से अफेयर हो गया. मनीषा हमारे मुहल्ले की सर्वाधिक ब्रिलिएंट लड़की थी, डबल एम ए थी और पीएचडी कर रही थी. मनीषा और मेरा अफेयर एक समय शादी की स्टेज तक पहुंच गया था, हालांकि ऐसा हो नहीं सका.

मेरे और मनीषा के अफेयर के बारे में धीरे धीरे सारे मुहल्ले को खबर हो गई थी. उस समय मुहल्ले की तमाम लड़कियां और भाभियां मुझे इस तरह से देखती थीं जैसे कि पूछ रही हों कि हममें क्या कमी थी.

बस एक जालान आंटी थीं जिनके विचार इससे भिन्न थे.
जालान आंटी मेरे घर के सामने रहती थीं, लगभग 60 साल की थीं और पढ़ाई के नाम पर अंगूठाछाप थीं लेकिन बहुत चतुर थीं. वास्तविकता यह थी कि वो जितनी चतुर थीं, उससे अधिक बनने की कोशिश करती थीं.

उनका एक बेटा था और एक बेटी. मैं उनकी लड़की पर कहीं डोरे न डाल दूं, इसलिये हर समय अपनी बेटी सुमन को मेरी बहन बनाने पर तुली रहती थीं- तेरी बहन का रिजल्ट आ गया है, तेरी बहन खाना बना रही है, तेरी बहन ननिहाल गई है. हर बात में तेरी बहन, तेरी बहन करती थीं.

इसमें कोई शक नहीं कि जालान आंटी की बेटी सुमन सुन्दर थी, मनीषा की अपेक्षा बहुत सुन्दर थी. लेकिन मेरा ऐसा कोई इरादा कभी नहीं था. कालान्तर में सुमन की शादी ग्वालियर हो गई और मनीषा की लखनऊ.

सुमन की शादी के डेढ़ दो साल बीत चुके थे.
एक दिन सुमन अपने आंगन में दिखी, पेट ऐसे फूला हुआ था, जैसे अभी डिलीवरी हो जायेगी. मैंने अपनी पत्नी से पूछा तो उसने बताया कि सुमन का नवां महीना शुरू हो गया है और इन लोगों में पहली डिलीवरी मायके में कराने का रिवाज है, इसलिये आई हुई है