हाय फ्रेन्ड्स! कैसे हो? दोस्तो, आप सभी लोगों का मैं तहे दिल से शुक्रगुजार हूं कि आप मेरी कहानी पढ़ते हो और आनंदित होते हो। मेरी पिछली लिखी कहानी
बहू के साथ शारीरिक सम्बन्ध
के लिये आप लोगों ने मुझे बहुत ही प्यारे मेल किये, जिसके लिये मैं आप सभी को धन्यवाद करता हूं।

आज जिस कहानी को मैं आपके सामने लाया हूं, यह केवल एक कहानी ही है. इस कहानी का वास्तविकता से कोई लेना-देना नहीं है। एक बार फिर मैं आपसे प्रार्थना करता हूं कि इसे एक कहानी की ही तरह पढ़ें।

अब मैं कहानी शुरू करता हूं.
मेरी उम्र उस समय कम ही होगी। तभी एक ऐसी घटना घटी कि हमारी जिंदगी उलट-पुलट हो गयी। बीमारी के चलते पिताजी की नौकरी लगभग खत्म हो गयी थी और दादा के पेंशन के थोड़े पैसे से ही हमारे घर का खर्चा बड़ी मुश्किल से चल पाता था।

घर के हालात का पता चलने के बाद मेरे मामा आये और पता नहीं घर में सबके बीच में क्या बातें हुईं कि मेरे मामा मुझे अपने साथ ले गये। मेरी पढ़ाई लिखाई, सब वहीं उनके घर में होने लगी। शुरू-शुरू में मुझे काफी तकलीफ हुई क्योंकि एकदम से अपना घर छोड़कर दूसरे घर में रहना मुश्किल लगा लेकिन फिर आहिस्ता-आहिस्ता सब सामान्य होता जा रहा था.

बस एक बात जो उनके घर में छ: साल बीतने के बाद भी संभव नहीं हो पाई थी, वो मेरे और मेरी ममेरी बहन शुभ्रा के बीच के संबंध की मधुरता थी. वो किसी न किसी बहाने मुझसे लड़ती ही रहती थी।

हलाँकि मेरे मामा और मामी बहुत अच्छे थे और शुभ्रा की बातों में आकर मुझे डाँटते नहीं थे, शायद इसी बात से वो और ज्यादा चिढ़ती थी। मैं भी उन्नीस साल का हो गया था और वो भी अठारह पार कर चुकी थी। वो मुझसे कुछ महीने छोटी थी.

कहते हैं कि उम्र के इस पड़ाव में आने के बाद अक्सर भाई-बहन एक-दूसरे के राज़दार हो जाते हैं।

हम दोनों कुछ दिन पहले तक दिनभर एक-दूसरे से लड़ते और झगड़ते रहते थे, किंतु अब हम साथ बैठकर बातें करते थे, पढ़ाई करते थे और कभी-कभी पढ़ते-पढ़ते रात को साथ सो भी जाते थे।

अब ये दोस्ती हुई कैसे? ये भी जान लें.